उत्तरकाशी जिले के ठिकोली गांव पर एक समय प्रकृति की भरपूर कृपा थी। कल-कल बहती भगीरथी (गंगा को देवप्रयाग से पहले भगीरथी कहते हैं) नदी, जरूरत भर अनाज पैदा करने वाले सुंदर सीढ़ीदार खेत, पशुओं के लिए चारागाह व प्राकृतिक जल-स्त्रोत। पर जब इस गांव में मनेरी भाली पनबिजली परियोजना के दूसरे चरण का कार्य प्रारंभ हुआ तब से गांव की यह सुंदरता और आत्म-निर्भरता बुरी तरह तहस-नहस हो गई।
इस परियोजना पर काम शुरू होने से आसपास के कई मकानों में इतनी अधिक दरारें पड़ गईं कि वहां रहना खतरे से खाली नहीं था। लोगों को कर्ज लेकर नए आवास बनाने पड़े। उनकी अधिकांश कृषि भूमि बहुत कम मुआवजा देकर परियोजना हेतु ले ली गई। जल-स्त्रोत सूख गया। नदी में पानी पहले से बहुत कम रहने लगा। स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ गई व परियोजना में नौकरी देने का वादा पूरा नहीं किया गया। नौकरी के लिए शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन कर रहे अनेक युवाओं को एक महीने के लिए जेल भेज दिया गया। उन पर मुकदमे अभी तक चल रहे हैं।
इस परियोजना से प्रभावित आसपास के कुछ गांवों की महिलाओं ने बताया कि पर्व-त्योहार पर गंगाजी में स्नान करना कठिन है क्योंकि कभी भी बैराज से पानी छोड़ा जा सकता है। शकुंतला ने बताया कि वह हाल ही में बहते-बहते बची। कुछ लोग तो बहकर मर चुके हैं। जंगली जानवर पानी कम मिलने पर सूखती नदी को आसानी से पार कर लेते हैं और गांव पर हमला करते हैं। सर्दियों में नदी में पानी बहुत कम हो जाता है व दुर्गंध आने लगती है। मछलियां बड़ी संख्या में मर चुकी हैं।
लोहारीनाग बांध परियोजना से प्रभावित तीहर गांव में मुआवजा तो बेहतर मिला है, पर स्वास्थ्य समस्याएं इतनी बढ़ गई हैं कि मुआवजे का अधिकांश पैसा इलाज में ही खर्च हो रहा है। यहां के बुजुर्ग व्यक्तियों ने कहा कि अचानक पैसा हाथ में आ जाने पर जुए व शराब जैसी आदतें भी बढ़ती हैं, पर दीर्घकालीन दृष्टि से देखें तो खेत, चारागाह व वन उजड़ने से भावी पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय हो गया है। पाला गांव के लोगों ने बताया कि टेस्टिंग सुरंग के निर्माण के बाद गांव में भूस्खलन का खतरा भी पैदा हो गया है।
News Source: NavbharatTimes
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